Wednesday, 23 November 2016

कामना, Desirous



कामना देखने में साधारण लगती थी मगर विचारों से व अपनी अभिव्यक्तिक दृष्टिकोण से वह औरों से अलग थी। निडर थी वह और लड़की होने के बावजूद अपने को किसी से कम नहीं मानती थीं। पढने में भी तेज थी और न किसी से गलत कहती और न बदार्श्त करती थी। ग्रामीण पृष्ठिभूमि में जब उससे या उसके सामने किसी अन्य निर्दोष को सिर्फ जातिवाद या लिंगभेद की वजह से कमतर ठहराया जाता तो वह लड़ पड़ती। वह अपने तर्कों से उनलोगों की इस सोच को गलत साबित करने की कोशिश करती। शायद उसमें कुछ खास था जो जब वह किसी विषय पर बोलती तो लगता जैसे दिल से बोल रही हो और उसका अंदाज इतना अनोखा होता कि लोग मान जाते और उसकी इस क्षमता की वजह से बिना प्रभावित हुए नहीं रह पातेे। वह औरों से अलग थी, किसी का जीहुजूरी नहीं करती बावजूद कुछ उसमें ऐसा था कि लोग उसे पसंद करते थे। शायद उसके अच्छे रिजल्ट की वजह से, उसकी सोच के नयेपन की वजह से या महिलावादी दृष्टिकोण की वजह से।

कामना के माता-पिता जरूर गरीब थे मगर शौकीन थे और बेटी होने के बावजूद उसे खूब प्यार करते थे। अपनी क्षमताओं के हिसाब से उसकी इच्छा पूराने की कोशिश करते थे। शायद इस वजह से भी उसका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था और वह अपनी समानता भरी सोच के साथ खुश रहती थी। इसे नसीब कहे या संयोग, मगर उसकी विशेष दृष्टिकोण की खबर आसपास फैलने लगी थी और इसी के अंतर्गत उसके लिए शादी का रिश्ता उसके बालिग होने के बाद से ही आने लगा था। उपयुक्त लगने पर उसके माता-पिता ने उसकी शादी करा दी। लड़के ने दहेज की मांग नहीं की थी, इसलिए भी कामना के साथ-साथ उसके मां-बाप भी खुश थे। शादी के बाद मिलने वाला रात का सुख कामना के पति गंभीर को ही नहीं कामना को भी विशेष दुनिया में ले आया था। दोनों इस सुख का खूब मजा लेते और प्रशन्न रहते।

मगर शादी के कुछ दिन के बाद ही उसका गौना हो गया और वह ससुराल में आ गयी। यहां सबकुछ बदल गया। जहां वह अपने मां-बाप की लाड़ली थी और उसके घर में उसकी बातों का महŸव दिया जाता था, अब ससुराल में उसका जैसे महŸव नहीं था। गरीब घर से आने की वजह से ज्यादा सामान उसके मां-बाप ने नहीं दिया था जिसका उसकी सास को बहुत शिकायत थी। आते ही सास ने भला-बुरा कहना शुरू कर दिया था। उसके पति की अपनी मां के सामने चलती नहीं थी। बावजूद कामना को तब तक अधिक शिकायत नहीं हुई जब तक कि उसका पति ससुराल में उसके साथ रहा। रात में जब उसका पति उसका बेड पर इंतजार करता और उसे प्यार से उसके दिल का हाल पूछता तो जैसे वह सब पीड़ाएं भूल जाती और पति का प्यार, सेक्स और उनके शरीर की विशेष ‘गर्मी’ पाकर फिर से  तरोताजा हो जाती।

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Image : Courtesy by stone-sculpture-old-temple-Hampi

मगर पति की छुट्टी खतम हो चुकी थी और परिवार का खर्चा चलाने के लिए कमाना जरूरी था तो वो चले गए। अब कामना अपने को अकेले पाती। दिनभर काम और सास की डांट-फटकार मगर रात में भी बिस्तर पर अकेले। कितने ही दिन ऐसे बीत गये मगर आज आज उसकी सास एक रिश्तेदार के यहां ठहर गई थी और बोल दिया था कि देर से आएगी या नहीं भी आए। वह घर में अकेली थी और फिर उसे अपने पति की खूब याद आ रही थी। उसे पति के साथ बिताया हुआ हर पल याद आ रहा था।


मनुष्य का यह स्वभाव कि जब भी अकेलापन आता है, फुरसत का पल होता हैं, उसे कोई याद आता है। वो जो उसे समझ सकें । उससे अपनापन जता सके और प्यार भी। शायद ऐसा शख्स जिसे वह छू सके, जो उसकी हर आवश्यकताओं को पूरी कर सकें। और वो भी जो उसका अकेलापन दूर करने के साथ-साथ उसकी जिंदगी को मजा व आनन्द भर सकें।
इसकी चाह महिला हो या पुरुष, सभी की होती है। आज कामना भी इस चाह से अपने को ग्रस्त पा रहीं थी। उसकी अगर शादी नहीं हुई होती तो पति के प्यार व सेक्स के सुख का वह मतलब नहीं समझती। मगर अब वह शादीशुदा और पति से मिले प्यार, अपनापन व सेक्स का अनुभव ले चुकी थीं और फिर इसकी आवश्यकता उसे लग रही थी।
यह भी मनुष्य की अजीब प्रवृत्ति कि अगर किसी चीज का सुख मिल जाय तो उसे पाते रहने की कामना अनन्त काल तक होती है। 
कामना का पति उससे दूर था मगर ‘उसकी’ जरूरत उसे खूब हो रही थी। अपने पति को छूने की और उसका पति उसे खूब प्यार करे, अपने यौवन की, अपने तन-मन की तृप्ति की चाह उसे तीव्र हो रही थी।
आज उसे इसका भी एहसास हो रहा था कि शादी मतलब पति-पत्नी का साथ होता है। अगर उसके पति में साथ रखने की क्षमता नहीं थी तो उन्हें उससे शादी ही नहीं करनी चाहिए थी। ऐसे किसी भी मर्द को शादी करने का हक नहीं जो बीवी को साथ न रख सकें, उसकी जरूरतें न पूरी कर सकें। ये यौवन की प्यास भी अजब कि आज उसे नींद ही नहीं आ रही थी। आज उसे अपने पति की परिस्थितियां, महंगाई व कम कमाई की वजह से पत्नी को साथ रखने में अपने को अक्षमता बताना, सब खराब लग रहा था।

उसकी सोच थीं कि थम ही नहीं रही थी ‘‘ उसे लग रहा था कि शादी के बाद ससुराल से जुड़ी जिम्मेदारियां महिला क्यों निभाए अगर पति का प्यार भी रोज नसीब न हो। फिर ऐसी सास जो उसे दिन-रात खटवाती थी। अगर सास के हिसाब से किसी काम में त्रुटि हो जाती तो बहुत उस पर चिल्लाती थी।  एक तो पति के बिना जीवन और ऊपर से सास की यह हिटलरशाही, उसे आज बहुत दुख हो रहा था और गुस्सा भी आ रहा था और ऊपर से इस यौवन की प्यास का हावी होना, सब उसे आज बैचेन कर रहा था‘‘
अंत में उसने कॉपी निकालकर अपनी व्यथा लिखी और पन्नों पर खुद को व्यक्त किया, तब जाकर उसे नीन्द आई।
अगले दिन उसकी सास आ गई और रोज के घरेलू काम का दिनचर्या शुरू हो गया। पूजा का सराय धोना, घर लीपना, चाय और फिर खाना बनाने की तैयारी, ऐसे ही कितने काम। कभी-कभी वह इतना थक जाती कि उसे लगता जैसे उसका जीवन नौकर के तरह काम करने के लिए हुआ है, जिसका पारिश्रमिक भी नहीं, सराहना के स्वर भी नहीं।
जैसे-तैसे समय बित रहा था। जब साल-छ महीना पर उसका पति आता तो वह खुश हो जाती, वरना उदास जिंदगी।
कामना चाहती थी कि वह पति के साथ रहे। अबकी बार दुर्गा पूजा में उसका पति आया तो उसने कहा, ‘‘सास मुझे प्यार नहीं करती। नौकरों से भी बदतर मेरे साथ पेश आती है। मैं उनके साथ नहीं रहना चाहती। आप मुझे अपने साथ ले चलिये। दिक्कतों में भी हम गुजारा कर लेंगे।’’
मगर गंभीर इस पर साफ शब्दों में बोल दिया, ‘‘ शादी के समय के कुछ कर्जे अब तक जिसे मुझे चुकाना है। जब तक कर्जें खतम नहीं हो जाते और मां तुम्हें ले जाने की अनुमति देती, नहीं ले जा सकता। मां के हिसाब से चलो तो वह तुम्हें प्यार भी करेगी। तुम गलत करो मत कि वह डांटे।’’

कामना ने गौर किया कि गंभीर मां का भक्त था और कुछ भी हो, अपने मां को गलत नहीं ठहराना चाहता और उसे ही हर बार चुपचाप उन्हें झेलने के लिए कहता। यह सब कामना को अच्छा नहीं लगता था मगर उसके पास पति की बात मानने के अलावा विकल्प नहीं था। उसके मां-बाप गरीब थे और उनके पास वह सदा के लिए रहने जा नहीं सकती थी। और इस तरह ससुराल ही उसका ठिकाना हो गया था जहां पति का दर्शन तो कुछ दिनों के लिए होता मगर सास की वह बहू थी, शायद नौकरानी भी।

उसे तब और दुख होता जब उसे पता चलता कि उसकी कई सहेलियां शादी के बाद पति के साथ रहकर खुश है मगर उसके नसीब में गरीब पति और गुस्सैल सास हिस्सा आया था। सपना तो उसके भी बड़े-बड़े थे मगर हकीकत कुछ और ही बयान करती।
चाहने को तो उसने भी शादी के साथ ही यह सपना देखा था कि अब पति का साथ उसे हर रोज मिलेगा। पति न केवल उसको सुनेंगे, उसके दुख-सुख में साथ देंगे बल्कि उसका पति हर रोज उसे खूब प्यार करेगा। उसे छुएगा और तन-मन दोनों को भरपूर आनन्द देगा। मगर जब तक पति रहता, तभी तक ही ये संभव हो पाता और उसके बाद रह जाती उदासी और इंतजार।

यद्यपि मनुष्य की यह भी फितरत कि अगर उसका मनचाहा हासिल न हो तो जैसी भी परिस्थिति, वह उसी में खुद को ढालने की कोशिश करने लगता है, कामना भी उसी परिस्थिति में अपनी खुशियां ढूंढने का प्रयास करती मगर कहां ये आसान होता है! किंतु कभी-कभी यह मनुष्य को चोर दरवाजों के तरफ ले आता है।
कामना ने समझ लिया था कि ससुराल में सास को मनाकर ले चलने में ही बु़ि़़द्धमानी तो वह अब और उनका ध्यान रखने लगी, साथ ही घर आने-जाने वालों के बीच ही खुद को व्यक्त करने की कोशिश करती। ननद लगने वाली रिश्तेदारों से हंसी मजाक और हां, जिनसे मजाक का रिश्ता होता, उससे हंस बोलने की कोशिश करने लगी।

ऐसे ही कामना का समय बीत रहा था मगर उम्मीद की किरण उसे तब अधिक नजर आई जब उसके रिश्ते का एक देवर शहर से लौटा था और उससे मिलने पर उसके रुप-गुण की तारीफ किया था। कितने समय के बाद वह किसी पुरुष से अपने प्रति कुछ मीठे बोल सुनी थी। उसे बहुत अच्छा लगा और उस दिन वह अंदर से मुस्कुरायी थी। धीरे-धीरे उसका देवर गोलू का आना बढता गया और कामना को भी अच्छा लगने लगा। वह उससे हंसी-मजाक करता तो प्रत्युŸार में वह मुस्कुरा देती या कभी वह भी जवाब दे देती।

एक बार वह गोलू के आने पर जब चाय बना रही थी तो सीक पर से दूध उतारते वक्त उसका आंचल ढलक गया,जब उसके देवर से नजरें मिली तो उसने देखा कि वह उसे निहार रहा था। वह भी शरमा गयी मगर उसके बाद से जैसे गोलू खुद को बड़ा जताने लगा था। अब अधिक खुलकर वह मजाक करने लगा और तारीफ भी। एक बार उसने मजाक में यहां तक कह दिया, ‘‘भाभी पर देवर का बहुत हक होता है। अपनी सुंदरता को ऐसे ही खराब मत करिये, कभी मुझे भी..।’’

 कामना ने उसे उस दिन जीभरकर देखा। रंग काला था गोलू का मगर शरीर से मजबूत लग रहा था। बातचीत भी ठीकठाक कर लेता था, कामना को लगा कि क्या ‘उसमे’ं वह ठीक होगा! फिर उसने अपने विचारों को झटक दिया और उसे लगा कि यह क्या सोच रही है वह?’’
मगर यह सोच एकतरफा नहीं थी और शायद गोलू के मन में कामना के प्रति ‘कामना’ जग गई थी। अगले दिन जब वह खाना बना रही थी तब फिर गोलू आया और उसके बगल में पहले के तरह ही बैठ गया। थोड़ा-बहुत बात करने के बाद उसने रसोइ घर में उस दिन कामना को चूम लिया और कहा कि आप बहुत सुंदर हो। मैं बहुत प्यार करने लगा हूं।’’
गोलू के अचानक इस प्रयास से कामना घबरा सी गई और बोली, ‘‘ कोई देख लेगा, प्लीज ऐसे मत करो।’’
इस पर गोलू बोला, ‘‘मैंने देख लिया है, काकी नहीं थी तो किया..।’’
‘‘ठीक है, ठीक है, मगर आगे से ऐसे मत करना। मैं शादीशुदा हूं और पराये मर्द से यह ठीक नहीं।’’
‘‘अगर मुझे पराया ही नहीं समझो तो..’’ गोलू के उŸार ने कामना को निरुŸार कर दिया और इस पर दोनों खिलखिला उठे।

अब गोलू कभी बातचीत करते तो कभी काम के दौरान बात-बेबात उसे छूने का प्रयास करता। ऊपर से बेशक कामना उसे ऐसा करने से मना करती मगर वास्तविकता में जैसे ही गोलू उसे छूता, कामना को भी मजा आता। कभी वह उसका होंठ चूम लेता तो कभी उसके वक्ष पर हाथ रख देता। इस स्पर्श में उसे पति के जैसे स्पर्श का आभास आने लगा और उसके बदन को यह सब अच्छा लगने लगा तो उसने ज्यादा विरोध नहीं किया। कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा।

यह सब इसलिए आसान हो पाया था क्योंकि गोलू का घर उसके घर के पास ही था और गाँव के आंगन की वजह से दीवाल नहीं था तो आने-जाने की रोक-टोक भी नहीं थी। फिर रिश्तेदारी उन्हें आने-जाने की विशेष छूट दी हुई थी।

उसे जैसे ही मौका मिलता, वह आ जाता और कोशिश करता उसे छूने की। कामना मुस्कुरा देती। गोलू का धीरे-धीरे उत्साह बढता गया। वह कामना को खुश करने का और प्रयास करने लगा और अपनी काकी को भी। वह उनलोगों के लिए अब कुछ-कुछ गिफ्ट लाने लगा जिससे उसकी सास भी गोलू से प्रसन्न रहती। कामना अपने लिए गिफ्ट पाकर और भी प्रसन्न रहने लगीं।
उसी दरम्यान शादी का मौसम था और उसकी सास की रिश्तेदारी में कहीं बुलाहट थी तो सास घर पर नहीं थी। गोलू ने काकी की अनुपस्थिति की वजह पूछा तो कामना ने बता दिया, ‘‘शादी में गई है। पता नहीं कब लौटे, शायद रात में या कल।’’

उस रात जब कामना सो रही थी और उसकी सास भी उसके घर में नहीं थी तो उसका वह देवर गोलू तब उसके कमरे में आ गया जब वह शौचालय के लिए जा रहीं थी और दरवाजा खुला छोड़ी थी। प्रायः गांव में शौचालय बाहर रहता है और उसके ससुराल में भी ऐसा ही था। जब फ्रेश होकर कामना अपने कमरे मंे आई तो देखा, गोलू उसके कमरे में था। उसे रात में अपने कमरे में देख कामना तत्काल घबरा गई मगर गोलू ने उसे आश्वस्त किया कि किसी को पता नहीं चलेगा, कुछ देर रहने दो तो वह मान गई।
काफी समय के बाद अपने बेडरूम में वह अकेली नहीं, एक पुरुष भी था। बेशक वह उसका पति नहीं था मगर उसका चाहने वाला तो था ही, उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
गोलू ने अब देर नहीं किया और उसका हाथ पकड़ उसे अपने बाहों में भर लिया और उसे चूमने लगा।
कामना आनंद मिश्रित घबराहट के साथ पुनः बोली, ‘‘ मगर किसी को पता चल गया तो क्या सोचेंगे, तुम चले जाओ।’’
‘‘अगर नहीं पता चले तो..’’
गोलू के स्पर्श ने कामना की ‘कामना’ बढाती जा रही थी। वह बोल उठी, ‘‘तो यह सब स्वीकार है।’’
‘‘फिर करने दो मुझे। तुम्हारी सास है नहीं और मैं लड़का हूं, हमारे मन से आने-जाने की छूट।’’
‘‘सच, नहीं न पता चलेगा।’’ कामना उत्तेजना में डूबती हुई बोली।
‘‘बिल्कुल नहीं पता चलेगा मेरी वो.. ।’’ गोलू कामना पर अपनी पकड़ बढ़ाते हुए बोला।
और फिर वो सब होने लगा जिसकी चाह कामना को ही नहीं, गोलू की भी थी। वैसे भी भूख चाहे पेट की हो या जिस्म की, जब इसकी अधिकता बढती है तो भोजन महत्वपूर्ण हो जाता है, पात्रता नहीं ।
जब लाईट आँफ कर गोलू ने कामना को विशेष तरह से छूना व चूमना शुरू किया तो वह भूल गयी कि यह उसका पति नहीं, कोई पराया मर्द है। जैसे-जैसे कपड़े उतरते गये, शरम भी हटता गया और फिर प्यार, प्यास व जिस्म का खेल काफी देर तक चलता रहा। दोनों ने एक-दूसरे के साथ जीभरकर खेला। जब यह खेल खतम हुआ, तब समाज और परिवार का ध्यान आया और गोलू अपने को सहज करते हुए अपने घर चला गया और कामना आज फिर मीठी नींद में सो पायी।

कुछ दिनों तक जीवन का यह दौर मजेदार रहा। दोनों सावधान रहते और दिन हो या रात, मगर जब कामना की सास नहीं रहती, यह मजेदार खेल खेलते। किन्तु यह सुख ज्यादा दिनों तक नहीं चला। कामना फिर उदास रहने लगी जब गोलू अपने नौकरी पर वापस चला गया। फिर वह अकेली हो गयी थी। उसने पति को खूब याद किया, बुलाई भी मगर उसके पति ने बोल दिया कि उसे छुट्टी नहीं मिलेगी, साल पूरा होने पर दीपावली में आएगा। अब क्या करें कामना!। उसके पास पहले पति की और अब गोलू के साथ की भी मीठी यादें थी। मगर यह काफी नहीं था। काफी दिनों से उसके जिस्म को भोजन नहीं मिला था और फिर वह प्यासी रहने लगी थी। बेचैन...! क्रमशः..

-कुलीना कुमारी, 22-11-2016

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