Wednesday, 5 April 2017

साजिश / Conspiracy





सदियों से महिला विरोधियों द्वारा खूब प्रचारित किया जाता रहा है कि महिला ही महिला की दुश्मन, मगर वास्तव में यह पुरुषवाद की साजिश है जिसकी आड़ में महिला-महिला को ही लड़ाकर अपनी ज्यादती ढकने का प्रयास किया जाता है। दहेज, रेप व वंशप्रथा के रूप में पुत्र की प्रधानता इस साजिश के कुछ नमूने हैं।
महिला के विरुद्ध एक अन्य साजिश में कानूनन हक होने के बावजूद सामाजिक रूप से पुत्री को सम्पत्ति में हिस्सा नहीं देना व दूसरी तरफ ससुराल में भी पति को मुखिया बनाए जाने से महिला के पास पति के अनुसार चलना अथवा उसकी गुलामी के लिए मजबूर होने के अलावा विकल्प नहीं बचता क्योंकि पति से विरुद्ध होकर जाए तो जाए कहां महिला?

ऐसे ही कई अन्य पुरुषवादी साजिशों के चलते महिला पिछड़ी हुई। यद्यपि कुछ महिलाएं आगे भी बढी है मगर इनकी संख्या कम, ऐसे ही महिलावादी पुरुषों की संख्या भी कम।

अधिकतर पुरुष महिलाओं के विकास में रोड़ा-सा। वे अपनी अथवा अपने से संपर्कित स्त्रियों को बहुत सताते हैं। कब तक महिलाएं चुप रहेंगी? इज्जत का ठीका महिलाओं के सर पर ही क्यों? क्यों ना उनके झूठे आदर्श के ढोंग को पर्दाफाश किया जाय? बंद घर में अथवा सार्वजनिक अपमान कब तक महिलाएं सहती रहेगी? क्यों न उस अपमान का खंजर पुरुषवाद पर भी चलाई जाय और एहसास करायी जाय कि दुश्मनी महिला के लिए बुरा तो पुरुष के लिए भी अच्छा नहीं ।

कहने का तात्पर्य यह कि समाज में सम्मान ऐसे ही नहीं मिलता, उसके लिए अपनी मजबूत स्तिथि दिखानी होगी। सर उठाकर जीने के लिए प्यार ही नहीं, नफरत का जवाब देने लायक महिला को भी होना पड़ेगा।
आवश्यकता से अधिक विनम्रता कायरता की निशानी और जो उसे कायर व कमजोर बनाए, उस अवगुणों को उतार फेंकना चाहिए।


हमारा देश त्योहारों का और यहां करीब सालभर कोई न कोई पूजा व त्योहार चलती है जैसे अभी नवरात्रि चल रहीं है और शक्तिस्वरुपा दुर्गा की महिमा जोरशोर पर। अगर महिला अपने जुल्म के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकती तो बेकार है-काली-दुर्गा की पूजा करना। अगर महिला खुद सशक्त नहीं बन सकती तो काली-दुर्गा के नाम पर झूठा दिखावा क्यों?
सिर्फ महिला की बात नहीं, अगर पुरुष सदस्य  अपने घर की महिलाओं को सशक्त बनने में मदद नहीं कर सकते, उसके लिए सुरक्षित वातावरण नहीं दे सकते तो इस दिखावा से महिलाओं को क्या लाभ?
 अतः स्त्री व पुरुष..दोनों को सोच बदलनी पड़ेगी व दृष्टिकोण भी। समझना पड़ेगा कि किसी चीज को मनाने का क्या प्रयोजन और व्यवहार में उसे कैसे अपनाये तभी वास्तविक लाभ।

इसके लिए सबसे पहले महिला समाज को आगे आना पड़ेगा क्योंकि कमजोरी उनमें और जब तक वे खुद नहीं चाहेंगी, उनकी कमियां कोई दूर नहीं कर सकता।  महिलावादी पुरुष से भी निवेदन कि अपने घर की महिलाओं को आगे बढाने हेतु उसे इस तरह का प्रशिक्षण दे जिससे वे सभी आवश्यक काम बिना डरे कर सके व किसी क्षेत्र विशेष में निपुण हो अपना जीविकोर्जन भी कर पाय। जबकि होता इसका उलट। महिलाओं को विभिन्न प्रकार का डर व समस्याओं की संभावना बताकर गुलाम बनाए रखने की कोशिश होती है जबकि जोरशोर से बताया जाता है कि महिला के लिए बाहर का माहौल ही खराब।

यह पूरा सच नहीं, क्योंकि 95 प्रतिशत रेप के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के अपने व परिचित ही दुश्मन। इसीलिए सिर्फ बाहर के पुरुष के खिलाफ की बात न कर घर व बाहर दोनों रूपों में महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण का इंतजाम किया जाना चाहिए।
आजकल उत्तरप्रदेश में एंटी रोमियो स्क्वाड का दौर हावी जिसमें प्रेमी जोड़ों को परेशान करने की बात भी सामने आई है। महिला सुरक्षा के नाम पर प्रेमियों को परेशान करना भी उचित नहीं बस जहां भी जबरदस्ती हो रहीं समाज में वह बंद हो।
इसके लिए जहां महिलाओं को मजबूत बनाने की जरूरत है, उसी के साथ लड़के बच्चों को भी बचपन से ही महिला के प्रति संवेदनशील व समानतापूर्ण सोच के साथ बराबरी का सम्मान दिए जाने वाले संस्कार देने की जरूरत है।

स्त्री-पुरुष के साथ-साथ हमारी सरकार का भी कर्तव्य कि हर मनुष्य के लिए वह निडरतापूर्ण माहौल प्रदान करे जिसमें महिला भी अपने हक के साथ आगे बढना सीखे, तभी महिला सशक्तीकरण संभव, पूरे समाज का सशक्तीकरण संभव। वरना महिला की ताकत शक्ति पूजा तक ही सीमित रह जाएगी जबकि मजबूती के लिए इसे साकार रूप देना जरूरी है।


-कुलीना कुमारी

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