Thursday, 1 March 2018

कामना पार्ट-10 / Desire Part 10



 ‘‘कोई औरत दारूबाज या आधे-अधूरे मर्द के भरोसे कब तक रहेगी..फिर तो हर्गिज नहीं अगर दूसरा विकल्प बनने को तैयार हो।   
                                                                                                                                 

                                                                                                               

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कामना अंधेरे कमरे में भी विशालकाय शरीर व उसके स्पर्श के तरीके से अंदाजा लगा लिया कि यह कोई और नहीं, रंधीर ही होगा। फिर भी कंफर्म करने के उद्देश्य से बोली, ‘‘कौन रंधीर! प्लीज छोड़िए भी !’’ और वह उठने की कोशिश करने लगी।

किंतु तभी फुर्ती से दो मजबूत हाथ उसे उठने से रोक दिया और बोला, ‘‘हां भौजी मैं ही हूं, प्लीज लेटे रहिए और करने दीजिए प्यार मुझे’’ व यह कहते हुए वह खुलकर कामना के होंठों को चूमने लगा और उसका हाथ स्वतः आंचल के नीचे पहुंचने की कोशिश करने लगा।

कामना समझ गयी कि इस पर ‘काम’ की तीव्रता सवार हो चुकी है। वह अपने को छुड़ाने की कोशिश करती हुई बोली, ‘‘प्लीज ऐसे न कीजिए, यह गलत है।’’

‘‘क्या कह रही हैं गलत, मगर कैसे? गांव में तो आपने करने दिया था, तब तो आपको गलत नहीं लगा मगर अब क्यों गलत लग रहा है? मैं करूंगा और यह कहते हुए वह कामना के ब्लाउज से वक्ष को स्वतंत्रकर पीने लगा। यह स्पर्श कामना में भी स्त्रियोचित उत्तेजना पैदा करने लगी मगर वह अब पति के प्रति ही समर्पित रहना चाहती थी। फिर उसे बीती रात का साथ भी याद था, जब पति खूब धीरे-धीरे उसके अंग-अंग को चूमते हुए, उसके सहमति के बाद करना शुरू किया था और काफी देर तक करते हुए उसे संतुष्ट भी किया था।

 यद्यपि इस पल रंधीर में पुरुषत्व उफान पर था व वह चाहता था कि पुनः कामना में स्त्रीत्व जगाकर उसको भोग लें। इस हेतु वह संपूर्ण कोशिश में लगा था, तभी इस पल पुनः रंधीर की पहल से उसका यौवन जग गया था व वह चाहने लगा था कि कोई फिर उसके साथ..! बावजूद कामना का विवेक सक्रिय था व वह चीज भी याद थी, जब गांव में रंधीर कामना को भोगने के अगले दिन से सार्वजनिक रूप से बहुत ज्यादा दुर्व्यवहार करने लगा था। उस दुर्व्यवहारी के साथ अब पुनः वह अपना तन-मन जोड़ना नहीं चाहती थी। फिर इसकी भी गारंटी नहीं थी कि इसके बाद वह कामना के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा। मनुष्य का मन दूसरे का मन पढना जानता है जिसमें एक ज्ञान यह भी शामिल कि एक बार जिसने धोखा दिया, उसके बार-बार धोखा देने की संभावना व ऐसे व्यक्ति से सच्चे व्यक्ति को बचकर रहना चाहिए।

यह भाव आते ही कामना सख्त होने लगी व जोर देकर बोली, ‘‘प्लीज रंधीर, छोड़िए मुझे। गांव की बात अलग, वहाँ आपके भाई साहब नहीं थे मगर यहाँ है। दोनों परिस्थितियों में बहुत फर्क है, इसको समझिये’’

मगर तब तक रंधीर बहुत उत्तेजित होने लगा था और उसे जहां-तहां सहलाते हुए कहा, ‘‘बहुत फर्क नहीं भौजी, मैं गांव में भी पहलवान सा था और यहां भी। मेरे भाई साहब आपको वैसे कहां कर पाएंगे, जैसे मैं कर सकता हूं, बस-बस डालने दीजिए, बहुत मजा दूंगा और वह नीचे की तरफ अपने को केंद्रित करने लगा। कामना को लगा कि अब भी इससे दूर न हुई तब तो यह सचमुच में.. नहीं.. नहीं..। मुझे नहीं करना और इसे रोकने के लिए कामना के अंदर नवीन ख्याल आया व वह रंधीर को चूम बैठी व चूमते हुए बोली, ‘‘मैं फ्रेश होकर आती हूं बाथरुम से..फिर..। 

कामना के इस पहल से व उसका चुंबन पाकर तो और वह पागल हो उठा जैसे कामना की सहमति सेक्स के मजा को दुगुना करने वाला हो। वह जोश के साथ नर्म हो आया व बोला, ‘‘ठीक है, आप हो आईए, फिर करूंगा। आप भी कीजिएगा ना, पहले की तरह।’’

‘‘हां क्यों नहीं’’ और यह कहते हुए कामना अपना साड़ी ठीककर बाहर हो आई, ट्वाइलेट की तरफ क्योंकि वह बाहर ही था।

फ्रेश होने के बाद उसकी उत्तेजना भी कम हो आई व दिमाग भी तेज चलने लगा। वह अपने कमरे में जाने के बजाय सीढ़ियों से नीचे हो आई और बैठ गयी वहां जहां उसकी पड़ोसन अपने परिवार के साथ रहती थी। उन्हीं से बातचीत करने लगी।

इधर बड़ी बेकरारी से रंधीर कामना का इंतजार कर रहा था। वह थोड़ी देर तक जब नहीं आई तो उससे रहा नहीं गया व वह स्वयं शौचालय के तरफ आया मगर देखा वह खाली तो भौजी-भौजी कहकर आवाज़ देने लगा। कामना समझ गयी कि क्यों बुला रहा मगर वह बचना चाहती थी तो प्रतिउत्तर में नीचे होने की सहमति तो दी मगर यह सुनकर कि कुछ जरूरी काम, जल्दी आईए, वह ऊपर आई मगर साथ में पड़ोसन के बच्चे को लेकर कि उसे ऊपर खेलाएंगे।

कामना को इस तकनीक के साथ कमरे में प्रवेश करते देख रंधीर आगबाबुला हो गया व धीरे से कामना को बोला, ‘‘मेरे साथ खेल खेल रही हैं, यह एट्टीयूड बहुत महंगा पड़ेगा आपको, कह देता हूं। अपना भला चाहती है तो अभी भी बच्चे को नीचे भेजकर मेरे पास आईए वरना जो भी होगा आपके साथ, उसके जिम्मेदार आप ख़ुद होंगे।’’
  
कामना बेफिक्र होकर बोली, ‘‘मुझे डराईए मत, आपको जो भी करना हो, कर लीजिएगा । मगर अब खुद को आपके साथ नहीं बाटूंगी, मुझे घिन आती है आपसे। मैं भूली नहीं जो दुर्व्यवहार आपने गांव में मेरे साथ किया था।’’

इतना सुनना था कि रंधीर का गुस्सा और बढ गया और बोल उठा, ‘‘औरत औरत की तरह रहें तो ही अच्छी लगती है, सवाल-जवाब उसके मुंह से शोभा नहीं देता। फिर जब औकात न हो तो बिल्कुल नहीं। अभी जो खुद को रानी समझ रही हो, वह मेरी वजह से। तुम्हारे पति की खुशी के लिए तुम्हारे काका के यहाँ से मैं तुम्हें लाया, यह किराये का मकान व इसमें जो सामान, वह भी हमारी देन। फिर भी इतना घमंड कि मुझे इंकार करो, बोल देता हूं, तुम्हें बहुत महंगा पड़ेगा।’’

अचानक ऐसी भाषा व धमकी सुन मन ही मन कामना डर गयी मगर बोली कुछ नहीं और पड़ोसन का बच्चा को जो कब से गेट के पास अपनी गाड़ी से खेलने में व्यस्त था, उसे पहुंचाने के बहाने पुनः नीचे चली आई।

इधर रंधीर बहुत गुस्से में था, शायद इतना कि अब अगर कामना वहीं रहकर मुंह लगाती तो पता नहीं उसके साथ क्या कर देता। उसके जाने के बाद वह भी गुस्से में घर से निकल गया।

कामना नीचे पड़ोसन की यहाँ से उसे मेन दरवाजे से बाहर जाते हुए देखी और उसके बाद अपने घर आ गयी। 

चूंकि सुबह काफी दिनों बाद कामना का पति गंभीर निकला था तो शाम ढलते-ढलते घर आ गया, तब तक कामना रात के लिए खाना बनाकर रख दी थी। दोनों खुश थे व गंभीर छोटे भाई का इंतजार कर रहा था कि वह आएगा तो साथ खाना खाएंगे।

उधर रंधीर गुस्से में घर से बाहर आ तो गया मगर उसका गुस्सा ठंढा ही नहीं हो रहा था। उसे कामना पर बहुत गुस्सा आ रहा था। उसे लग रहा था कि गांव में तो यह मेरे इशारों पे चलती थी, जब जो मन होता था, वो कर लेता था किंतु यहां इतना कुछ इसके लिए किया भी, फिर भी मुझसे ‘करवाने से’ मना कर दिया। बहुत गलत किया उसने। उसे ध्यान आ रहा था कि कल रात कितना खिलखिलाकर करवा रही थी मेरे से कमजोर भाई से (बाहर तक सुनाई पड़ रहा था) मगर मुझे नहीं करने दिया जबकि काफी दिनों बाद आज भाई किसी काम से बाहर गया था तो सोचा था कि गांव की तरह आज भी उसके साथ ठीक से करता। शायद इतना ठीक से कि वह स्वयं बोल उठती, ‘‘देवर जी बहुत मजा आया..आप तो अपने भाई से भी बढिया है।’’ मगर नहीं, यहां तो उसने साथ देने से ही मना कर दिया।

किसी भी पुरुष के लिए यह सबसे बड़ा अपमानजनक होता है कि जिस महिला के साथ कभी उसने प्यार-सेक्स किया हो, वह दोबारा देने से मना कर दें। ऐसी महिला को वे अपनी संपत्ति सी समझने लगते हैं और शायद सोचते हैं कि अगर वह उसे इन्कार करें तो उसके साथ कुछ ऐसा कर दें कि अगर वह उसकी न हो तो किसी और के साथ भी वह मुंह दिखाने लायक न रहे। मगर ऐसा क्या करें, वह सोचता ही जा रहा था। अचानक उसे दारू की दूकान दिखी और दारू पीकर देर रात घर आया।

गंभीर साथ खाने हेतु उसका अब तक इंतजार कर रहा था और फिर पति का साथ देने हेतु कामना भी।

गंभीर रंधीर के आते ही बोला, ‘‘ काहे इतनी देर लगा दीं...चलो खाना खा लेते हैं, लगाओ खाना कामना।’’

रंधीर कामना से गुस्सा तो था ही, भाई कोे कामना से प्यार से बोलते देखकर वह फूट पड़ा और बोला, ‘‘भाईजी, आप पत्नी को रानी बनाए हुए हैं मगर यह तो बहुत नीच प्रवृति की औरत है। गांव में मां को परेशान करके रखती थी, रीति-रीवाज को तो मानती नहीं । गांव में ढंग से घरेलू काम भी नहीं कर पाती थी, ऊपर से बेहया ऐसी कि हर आने-जाने वालों से हंस-हंसकर बात करती थी।’’

इस पर गंभीर बोला, ‘‘रंधीर सबका अपना-अपना स्वभाव होता है, मैं भी हर रीति-रीवाज कहां मानता हूं और मेहमानों से खुश होकर बात करना तो अच्छा ही है।’’

इस तरह के जवाब की उम्मीद रंधीर को अपने बड़े भाई से नहीं थी, यद्यपि ऐसा जवाब सुन कामना प्रसन्न हुई कि मेरे पति मेरे स्वभाविक स्वतंत्रता की इज्जत तो दिए।

किंतु रंधीर हार मानना नहीं चाहता था और वह अंतिम दांव फेंका और बोला, ‘‘बात इससे भी आगे हैं भाईजी, आप नहीं थे गांव में तो यह मेरे पास आ जाती थी, मुझे बाहों में ले लेती थी और और।’’

ऐसी बात भी रंधीर करेगा, कामना को उम्मीद नहीं थी, वह सुनी थी कि महिला आरोप लगाती है कि फंलाने पुरुष ने छेड़ा है लेकिन यहाँ तो कामना ने उसके साथ सोने से मना किया तो उसको लेकर ऐसी बात बोलने लगा। उसे लगा कि अब जवाब नहीं देंगी तो शायद देर न हो जाय। वह पति के सामने ही रंधीर से मुखातिव होते हुए बोली, ‘‘यह झूठ बोल रहा है जी! आप ख़ुद सोचिए कि क्या यह संभव है कि आपके पहलवान जैसे भाई को कोई महिला जबरदस्ती उसे बाहों में लेले और ..और.. उसमें भी मैं जो कि मैं इतनी दुबली-पतली हूं।’’

रंधीर के मुंह से ऐसा सुन गंभीर को लगा कि सच में ही रंधीर किसी बात से कामना से खफा है व जानबूझकर इस ईर्ष्या में उससे गुस्सा कर रहा है। वरना अगर कामना सच में बुरी होती तो वह पहले ही कामना के खिलाफ ऐसी बात क्यों नहीं बोलता, आज क्यों?’’

वह ऐसा सोचते ही बात को हल्का करने की कोशिश करते हुए बोला, ‘‘तो क्या हुआ तुम्हें बाहों में ले भी लिया कामना तो..देवर ही तो हो। अरे अब जाने भी दो व बैठो खाने के लिए।’’

पुनः रंधीर की कामना के खिलाफ दाल नहीं गली और वह खाना तो खा लिया मगर अत्यधिक दारू पीने की वजह से वह सोने तो गया मगर रातभर सोने वाले बिछौने पर ही उल्टी करता रहा। 
कामना में एक गंदी आदत थी कि वह किसी उल्टी वाले स्थान पर रहें, उसे साफ करना चाहे तो उसे खुद भी उल्टी आने लगती है। इस वजह से वह रंधीर के बिछौने को साफ करने से मना कर दिया। जैसे-तैसे गंभीर ही उसका रातभर ध्यान रखता रहा। 

सुबह हुई तो सूरज की किरणों के साथ कामना भी तीव्र हो गयी। उसे कल का व्यवहार याद था व रंधीर द्वारा उसके पति की नजर से गिराने की कोशिश भी। उसने रंधीर से बात करनी बंद कर दी व गंभीर से अलग से बता दिया कि अगर उसके भाई दारू पीकर बार-बार आएंगे तो कहीं मकान मालिक नराज हो मकान न खाली करवा दें, इससे अच्छा यहीं कि रंधीर को बोल दिया जाय कि वह आगे से दारू पीकर न आएं। 
यह प्रयोग काम आया व गंभीर ने अपने छोटे भाई से अपने अंदाज में आगे से दारू पीकर न आने को बोल दिया। रंधीर के लिए यह बात अपमानजनक लगी कि उसका भाई भौजी के सामने कैसे उसे ऐसा कहा ...जबकि वह कामना को अपने भाई की नजर से गिराना चाहता था मगर यहाँ तो वहीं गिर गया। 
उसके बाद रंधीर मुश्किल से एक-दो दिन और रुका होगा व अपने ठिकाने पर वापस चला गया। 

अब कामना ने चैन की सांस ली, उसे लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा। खुश थी वह कि अब जीवन में उथल-पुथल कम होगी मगर यह इतना आसान भी नहीं था। कमाई के स्रोत का अभाव खटक रहा था, महीना चढ गया था मगर मकान का किराया गया नहीं था, जैसे-तैसे दोनों समय की रोटी जुट पाती थी, अगर कमाई बढाने की बात करती तो गंभीर कामना पर गुस्सा होने लगता था। जब तब मकान मालिक का ताना व धमकी कामना को अच्छा नहीं लगता था मगर जैसे विकल्प ही नहीं बन रहा था। और फिर गंभीर को जिस चीज से बचने के लिए कामना ने कहा था, पता नहीं कब कैसे, उसी दारू का ख़ुद शिकार हो चुका था। अच्छा खानपान नहीं, मकान मालिक का ताना व ऊपर से रात में दारू पीकर जानवर के जैसे अरुचिकर सेक्स प्रक्रिया या फिर कामना को संतुष्ट नहीं कर पाना/ जल्द खत्म हो जाना, ये सब गंभीर के प्रति कामना के मन से प्यार को कम करता जा रहा था। जैसे जिंदगी खींच रही थी बिना प्यार जोश के किंतु एक दिन कामना का नजरिया बदल गया जब अचानक से उसकी नजर सामने वाले पड़ोसी इन्द्र से टकरा गयी। वह देखने-सुनने में बहुत खास नहीं था मगर दिल का मामला दिल को ही पता किंतु कामना को वह भा गया। शायद उसके भाने के पीछे यह भी वजह रही हो जिसमें उसकी पड़ोसन बनाम उसकी पत्नी बोली थी कि वह मजबूत मर्द जब एक बार कामना चर्चा कर रही थी कि उसके पति अधिक देर तक टिकते ही नहीं जबकि पड़ोसन बोली थी कि वह अपने पति से पूरी संतुष्ट ।

वजह चाहे जो भी हो मगर कामना को वह भा गया तो भा गया। फिर इस बीच कुछ ऐसा भी संयोग बना कि नीचे का कमरा खाली हुआ और पति के साथ वह ऊपर से नीचे शिफ्ट हो आई। अब पड़ोसी इंद्र और उसका कमरा अगल बगल था व एक-दूसरे को देखना-सुनना आसान था। फिर उसके पास टीवी थी तो फिल्म-सीरियल देखने के बहाने भी उसके पास आने की स्वभाविक वजह बन गयी थी। अतः कामना को जब भी मौका मिलता वह उसे देखती किंतु दिल की बात बोलने का अवसर नहीं मिला था। लेकिन जल्दी ही कुछ ऐसा हुआ कि उसके पड़ोसी इन्द्र की पत्नी कुछ दिनों के लिए मायके गयी।  फिर तो मौका देख कामना अपने दिल की बात उसे बता दी। फिर तो नजारा बदल गया। 

एक पुरुष के लिए यह बहुत बड़ी बात कि कोई उसे चाहे और अगर वह सुंदर भी हो तो उसके लिए सोने पे सोहागा।  अब इन्द्र खुलकर कामना का साथ चाहने लगा और इसी चाहत में वह एक दिन तब आया जब गंभीर घर पर नहीं था। वह मर्दाना प्रवृत्ति के साथ उसके एकदम पास आकर चूमने लगा और...कहां ‘‘प्यार का असली मतलब तो पता है ना? पूरा साथ तो..खोलो !
ऐसा सुनते ही व इंद्र का नवीन स्पर्श पाकर वह मस्त होने लगी। फिर कुछ दिनों से तो उसके पति दारू के साथ सो रहे थे, या तो करते नहीं थे और अगर करते भी थे तो उनसे होता नहीं था। ‘‘कोई औरत दारूबाज या आधे-अधूरे मर्द के भरोसे कब तक रहेगी..फिर तो हर्गिज नहीं अगर दूसरा विकल्प बनने को तैयार हो। 
कामना इंद्र के स्पर्श के साथ झूमते हुए बोली, ‘‘ठीक खोल दूंगी मगर कोई आ गया तो!’’
‘‘चिंता मत करो, उसका इंतजाम कर लिया। मेन गेट बंद और ऊपर सीढ़ियों का गेट भी बंद कर दिया। कोई आना चाहेगा तो पहले दरवाजा खटखटाएगा..तब तक हम सावधान हो जाएंगे।’’
कामना इंद्र के दिमाग से प्रसन्न हुई और फिर खुलकर प्रेम का खेल खेलने को तैयार हो गई। इंद्र बेकरारी से कपड़े के नीचे से उसका वक्ष पकड़ता हुआ बोला, ‘‘कितना कष्ट दोगी..अब तो पूरा खोलो ताकि खुलकर मजा लेने का मौका मिले।’’

‘‘लो ना, कौन रोक रहा है?’’
‘‘खोलकर दो ना..’’
‘‘अभी तुरंत और कामना ने ऊपर का वस्त्र उतार दिया।’’
इंद्र यहीं तो चाहता था और उसे जहां-तहां चूमते हुए बोला, ‘‘नीचे का भी खोल दो ना..पूरा प्यार तभी तो हो पाएगा।’’
कामना इंद्र की बेकरारी का मजा लेती हुई बोली, ‘‘जरा देर और खेलिये..फिर..।’’
ऐसा सुनते ही इंद्र तेज-तेज .......! क्रमशः...


 -कुलीना कुमारी

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