Friday, 14 February 2020

प्यार क्यों जरूरी

                                                         प्रतीकात्मक तस्वीर
                     साभार  https://www.google.co.in/search?q=valentine+day


प्रेम हर रूप में खूबसूरत है। यह कही आग है, मस्ती तो कही असीम प्यास तो कही तृप्ति। प्रेमोत्सव के इस अवसर पर हम हर प्रेम करने वाले को नमन करते हैं।

                                                                                                         -कुलीना कुमारी



वेलेंटाइन दिवस के नजदीक आते ही प्रेमियों के मन में प्रेम कुछ अधिक तीव्र रूप में हिलोरे लेने लगाता हैं, तभी हर साल अपने भारत सहित विभिन्न देशों में 14 फरवरी को वेलेंटाइन दिवस के रूप में मनाया जाता है। बेशक इसका इतिहास पुराना है लेकिन आज यह बड़ी संख्या में  प्रेमियों के जोश और उत्साह के पर्व के रुप में युवाओं के बीच में लोकप्रिय है। फिर वेलेंटाइन दिवस बनाम प्रेम दिवस का वसंत ऋतु में आगमन और प्रेमी-प्रेमिका के मिलन की कहानी भारतीय जनमानस में भी लंबे समय से सुरूचि का विषय रही है। और यह हो भी क्यों नहीं, जीवन का उद्ेश्य ही प्रेम है। यह प्रेम ही दो अनजान को एक-दूसरे से जोड़ता है और ऐसे एक-दूसरे में मगन कर देता है कि वे दो होकर भी दो नहीं रहते। जिंदगी रुचिकर लगने लगती है, जीने में मजा आने लगता है, इतना मजा कि दिखावा, लाज-शर्म सब छूट जाती है और अपने प्रिये के प्रति तन-मन दोनों समर्पित रहने लगता है, अपने सम्पूर्ण रूप के साथ। तभी जब आदमी प्रेम में होता है तो समानता का सिद्धांत पढ़ना नहीं पड़ता, स्वतः सीख जाता है। आदमी अपने प्यार के लिए कुछ भी कर गुजरना सीख जाता है, झुकना सीख जाता है, मिटना सीख जाता है।
 
तभी ये कथन सत्य कि जाति-धर्म-उम्र का फर्क प्रेम में रुकाट नहीं होती। क्योंकि अंतर जातीय, अंतर धर्मीय शादी करने वाले अथवा अलग-अलग जाति धर्म वाले से दिल लगाने वाले प्रेमी जानते होते हैं कि  उपर्युक्त फासला उन्होंने कैसे तोड़ दिया बल्कि हो सकता है, इससे पहले तक उनके लिए भी यह सब विभेदपरक रहा होगा। लेकिन प्रेम होने के बाद आदमी असली खुशी पहचान पाता है। इसलिए प्रेमोत्सव चाहे वेलेंटाइन दिवस के रूप में मनाया जाय या किसी भी रूप में...प्रेम की हमेशा जय हो। क्योंकि प्रेम आदमी को अच्छा-सच्चा बना देता है। इतना तो खास जरूर बना देता है कि प्रेम मेें आने के बाद प्रेमी से मिलने वाला कुछ मधुर पल इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि इसके सामाजिक विरोध, बदनामी भी छोटी लगती है। बदनामी ही क्यों, अभी भी कुछ घर वालों द्वारा प्रेमियों के साथ निकृष्टतम सलूक किया जाता  है, ऑनर किलिंग भी अस्त्वि में , फिर भी प्रेम नहीं मिटा।

तभी हर युग में अपने दिल के आगे मजबूर हो प्रेमी ने अपने प्यार को पूजा। बिना कुछ की परवाह किए एक-दूसरे को गले लगाया, जीभरकर टूटकर प्रेम किया, करते ही रहेंगे। यद्यपि अच्छी बात यह कि आधुनिकता और शिक्षकीय जागरुकता के साथ स्वेच्छा से जीवनसाथी चुनने वालों की संख्या अब अपने देश में भी बढ़ने लगी हैं। करीब-करीब हर परिवार में एक जोड़ा आपसी प्रेम के बाद शादी करने वाले मिलने लगे हैं। बड़े और माता-पिता भी अपने बच्चों की पसंद पर धीरे धीरे ही सही लेकिन उनकी सहमति पर मुहर लगाने लगे हैं। एक और खास बात यह है कि प्रेम के बाद स्वेच्छा से शादी करने वाले जोड़े अपने मां-बाप को अपने सही-गलत पसंद को लेकर कोसते नहीं हैं और वे स्वयं जिम्मेदारी लेते हैं।  कुछ मामलों में देखा गया है कि प्रेम वह अमृत भी है कि बहुत से बेरोजगार या कामचोर लोग शादी के बाद अपनी पत्नी के प्यार में आकर काम करने लगते हैं। अथवा पैसे कमाकर देने लगते हैं ताकि पति या पत्नी के दिल में उसकी इज्जत रहें।

यद्यपि प्रेम को लेकर कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं, जिस पर विचार किया जाना चाहिए। एक तरफा प्रेम अथवा प्रेम में मिलने वाला धोखा, दोनों ही मनुष्य के मन को बहुत चोटिल करता है। लेकिन ऐसी परिस्थिति में विवेक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। क्योंकि प्रेम मुफ्त की चीज नहीं, यह स्वेच्छा से एक-दूसरे के प्रति पैदा होती है। अगर कोई किसी विशेष के प्रति नहीं सहदय हो पा रहा, तो इसका मतलब वह उसके लिए नहीं बना। मेरा मानना, कोई न कोई सबके लिए बना, जो

आपके लिए बना होगा, वह समय आने पर जरूर मिल जाएगा। धोखा की स्थिति में भी ज्यादा गुस्सा अथवा तनाव पालने की जरूरत नहीं, जब कोई वफा नहीं कर पा रहा या और साथ नहीं चलना चाह रहा तो उसको पकड़े रहने से भी कोई फायदा नहीं। इसलिए भी प्रेम में असफलता की वजह से न तो तनाव पालना चाहिए और न आत्महत्या जैसे घृणित कदम उठाने चाहिए। 

किंतु हां, कुछ लोगों का कहना कि प्रेम सबको नसीब नहीं होता, यह बस कुछ लोगों के हिस्से में आता हैं तो बताना चाहती हूं कि प्रेम के लिए सबसे पहले खुद को छल-कपट रहित बनाना पड़ता है। पूरे सच्चे मन से विश्वास करना पड़ता है, वफादारी भी। तब जाकर दूसरा पक्ष भी व्यक्ति विशेष के प्रति समर्पित हो पाता है। साथ ही, यह जरूरी भी नहीं कि एक तरफा समर्पण के बाद दूसरा समर्पित हो ही जाय। न होने की स्थिति में भी सामने वाले के प्रति दुश्मनी न किए जाये। कई बार प्रेम का असर धीरे होता है और कभी कभी बहुत तीव्र। कुछ भी, कैसा भी प्रेम का रूप हो सकता है। निर्भर इस पर करता है कि हमारा मन  किसे चाहता है और उसके लिए क्या क्या कर सकता है। यद्यपि आग एक तरफ लगी हो तो बहुत संभावना, चिंगारी दूसरे तरफ भी जलेगी।

हां प्रेम शायद तप भी है, भक्ति भी। कही विरह तो कही मिलन रूपी स्वर्ग सा आनंद यह। बस किसके हिस्से में कैसा प्रेम, यह व्यक्ति विशेष की कोशिश और उसका नसीब तय करता है। प्रेम हर रूप में खूबसूरत है। यह कही आग है, मस्ती तो कही असीम प्यास तो कही तृप्ति। प्रेमोत्सव के इस अवसर पर हम हर प्रेम करने वाले को नमन करते हैं। नमन इसलिए भी कि छलकपट और मृगमरीचिका से भरी दुनिया के जकड़न से बाहर निकालने में प्रेमी सबसे बड़ा पथप्रदर्शक हो सकता है।

सच, उम्र सीमित है, जीवन भी तो क्यों ना प्रेम की ओर चलने का संकल्प लें। उस प्रेम की ओर जहां प्रीतम ही नहीं, अन्य लोग भी पराये नजर न आएं।

-कुलीना कुमारी

Editorial  of February 2020

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