Wednesday, 4 March 2020

कामना : भाग 11 / Kamana : Part 11



कामना: भाग 11



इंद्र पागल सा हो गया, कामना का पूरा खुला रूप देखकर। अब वह कमनीय औरत को देख रहा था, जहां वह मर्द था और दोनों के बीच मात्र प्यार और सेक्स का संबंध ही स्थापित किया जा सकता है और इसके लिए उसका पुरुषार्थ आकुल हो रहा था....

प्रतिकात्मक तस्वीर

कामना इंद्र की सेक्सुअल पहल से अजीब सी बेचैनी महसूस करती जा रही थी, प्यार मिलने की बेचैनी, पाने की बेचैनी और और उसे तृप्ति की हद तक पहुँचाने की बेचैनी।

हाँ, टेस्ट में फर्क तो था, तरीके में भी... अर्थात जब कामना के साथ उसका पति सोता था तो वह उससे पूछता नहीं था लेकिन जब इंद्र ने सोने की पहल की तो उसके हिसाब से, मर्जी से पूछ पूछ कर आगे बढ रहा था। कामना ऐसा ही चाहती थी कि प्यार तो हो, सेक्स भी हो उसके साथ लेकिन उसके मन अनुसार हो इंद्र में वह ऐसे ही मर्द की कल्पना कर रही थी और चाह रही थी कि काफी दिनों के बाद एक नया आदमी जिसके ख्यालों में वह खोने लगी थी, उससे प्यार करने लगी थी...वह जब सोये तो खूब मजा दें उसे।


तभी उसे महसूस हुआ कि इंद्र उसके वक्ष को कुछ अधिक तेज से पीने लगा था।

कामना बोली, ‘‘अरे जरा धीरे’’ 
‘‘नहीं, तुम्हें तेज पसंद है न, तो करने दो’’ इंद्र बोला
‘‘किंतु इतना भी तेज नहीं...!’’
‘‘ठीक है तो नीचे खोलो फिर छोड़ूंगा’’ इंद्र ऊपर से नीचे की तरफ अपनी आकुलता दिखाते हुए बोला।

कामना समझ गयी थी कि इंद्र अब बहुत गर्म हो चुका है और उसे अब कामना को पूरी तरह निर्वस्त्र देखना है। गर्म तो कामना भी हो रही थी... उसने अपनी सलवार की डोर को ढीला कर दिया।


कमरे की लाईट बंद थी लेकिन दिन होने के कारण बंद कमरे में भी आती चोर रोशनी कुछ होने की गवाही दे रही थी। इंद्र पागल सा हो गया, कामना का पूरा खुला रूप देखकर। अब वह कमनीय औरत को देख रहा था, जहां वह मर्द था और दोनों के बीच मात्र प्यार और सेक्स का संबंध ही स्थापित किया जा सकता है और इसके लिए उसका पुरुषार्थ आकुल हो रहा था। वह कामना के निर्वस्त्र शरीर पर धीरे धीरे हाथ फेरने लगा, उसके स्तनों को सहलाते हुए उसके हाथ नीचे की ओर जाने लगे, नाभि पर कुछ रुक कर वह थोड़ा और नीचे उसके हल्के से रोओं में उंगलियाँ घुमाता रहा। घुमाते घुमाते एक दो बार वह उंगली को कामना के अंदर तक ले गया। कामना से भी अब रहा नही जा रहा था, उसने हाथ बढ़ा कर इंद्र के कपड़े हटा कर उसका विशिष्ट अंग अपने हाथ मे ले लिया और उसे आगे पीछे हिलाने लगी। इंद्र अब बिना देर किए कामना के ऊपर चढ गया।  वह कभी ऊपर चूमता तो कभी नीचे, वह कामना को जैसे अपनी आँखों और स्पर्श से पूरी तरह देख और पा लेना चाहता था। उस कामना को जिसने स्वयं पहल करके उससे प्यार करने की बात स्वीकार की थी। ठीक है, इंद्र ने बहुत सी मूवी देखी थी, कुछ मूवी में स्त्री का बोल्ड रूप भी देखा था लेकिन ऐसा रूप जिसमें लड़की ही प्यार की पहल करें वह भी उसके जीवन में लाइव, उसने कल्पना नहीं की थी। किंतु जब यह सुअवसर उसके जीवन में संभव होने जा रहा था तो उसे वह पूरी तरह से पा लेना चाहता था।


फिर कामना उसका साथ दे रही थी। पूरी तरह से वस्त्र उतर जाने के बाद कामना की आंखों से शर्म भी उतर गयी थी, अब कामना उसके संवेदनशील अंग को चूम रही थी। इंद्र अब और मस्त होता जा रहा था क्योंकि उसकी पत्नी उसके अंग को चूमती नहीं थी। लेकिन यहां सब उल्टा हो रहा था। अब तो वह और खुलकर सेक्स के लिए तैयार हो गया था।


‘‘कामना, अब शुरु कर लूं क्या, देखो ना...बहुत प्यासा हो चुका है’ इंद्र केंद्रीय स्थान को प्यार करता हुआ बोला।


‘‘ठीक है लेकिन जरा आराम से...!’’ कामना अजब सी कसमसाहट महसूस करती हुई बोली।


इंद्र को इस अनुमति मिलने की देर थी और जब प्रेम से शुरू होकर सेक्स का खेल शुरू हुआ तो काफी देर तक चलता रहा।


कामना इस नये अनुभव को पूरी तरह से ग्रहण करना चाह रही थी, उस हद तक ताकि काफी दिनों तक पति गंभीर सेक्स में फिसड्डी भी हो तो यह नया सेक्सुअल रिलेशन मधुर जोश बनकर रहें और इसकी टीस और याद जीने का पुनः पुनः उत्साह प्रदान करें।


खैर, इंद्र ने काफी मेहनत की और कामना का सौभाग्य कि उसे अपने पड़ोसी के रूप में ही प्रेमी मिल गया था। ऐसा प्रेमी जो उसके साथ इज्जत से पेश आता था और उसके शरीर को प्यार कर उसे तृप्ति का अनुभव भी करा देता था। सावधानीवश जैसे ही कामना और इंद्र इस प्रेम सेक्स के खेल से निवृत्त हुए, इंद्र अपने कमरे में चला गया और कामना भी बाथरुम से फ्रेश होकर आ गयी ताकि सब पहले जैसा लगे।


अब बहुत कुछ बदल गया था। इंतजार बदल गया था, अब उसे पति के आने का कम, उनके जाने का इंतजार रहने लगा था ताकि वे जाएं तो इंद्र आए।यद्यपि इंद्र नौकरीशुदा था लेकिन कामना का प्यार पाने के लिए वह बॉस की तीमारदारी सीखने लगा था। कहाँ वह टेढी में रहता लेकिन अब वह सीनियर की चापलूसी कर कार्यालय से थोड़ा जल्दी आने की कोशिश करने लगा ताकि जैसे ही गंभीर बाहर हो और कामना का सिग्नल मिलें तो वह उसके कमरे में आ जाए।


और इंद्र ऐसा करता भी क्यों नहीं कि सुंदर लड़की भला किसे पसंद नहीं और उसमें भी ऐसी लड़की जिसे उसे बरगलाना नहीं पड़ा, बल्कि जो स्वयं अपनी मर्जी से खोलकर...उठा उठाकर देने को तैयार हो।


दो तीन दिन बाद पुनः इंद्र को एकांत मिला तो देखा, अब उसे खुशामद करना नहीं पड़ा। तब पहली बार था तो...कामना ने ज्यादा एक्सरसाइज कराई थी....लेकिन इस बार जैसे सेक्स के लिए वह पहले से तैयार थी क्योंकि इस बार कामना नाईटी पहनी हुई थी।उसकी उभरती हुई जवानी और इंद्र के लिए दरवाजा खुला छोड़ना..उसे यह समझने के लिए काफी था कि कामना प्यासी है और इंद्र उसे तृप्त करें। इसीलिए इस बार इंद्र कामना से अनुमति नहीं लिया और शुरु हो गया। कामना भी साथ देती रही और उफ..इतनी आग....इंद्र अपनी रफ्तार बढ़ाता जा रहा था लेकिन कामना तृप्ति ही नहीं हो पा रही थी। अबकी बार इंद्र कमजोर पड़ चुका था लेकिन कामना प्यासी रह गयी थी। इंद्र तो अपने सेक्सुअल संतुष्टि के बाद अपने कमरे में चला जा चुका था लेकिन कामना अनमनी सी थी। उसे अफसोस हो रहा था कि इस सेक्सुअल संतुष्टि के लिए पराये मर्द का साथ भी लिया लेकिन मिला क्या...कुछ भी नहीं. उल्टे वह और प्यास बढाकर चला गया।


उस रात जब कामना का पति सोने के लिए बेड पर आया तो वह स्वयं आगे बढ़कर पति को छूने लगी और पति को सेक्स के लिए उकसाने लगी क्योंकि इंद्र द्वारा अधूरा छूट जाने से तब से उसका स्त्रीत्व तृप्त होने के लिए तड़प रहा था।पति खुश हुआ और खुलकर प्यार करने लगा। उस दिन पति का प्यार और साथ पाकर कामना खुश हुई।


कुछ दिन के बाद फिर से इंद्र गंभीर की अनुपस्थिति में आ गया। और फिर सेक्सपरक खेल शुरू करने लगा, कामना कुछ बोली नहीं, शायद उसे उम्मीद थी कि आज शायद अच्छे से वह कर पाएगा।


किंतु अफसोस...इस बार भी वह टिक न सका। कामना का फिर तो इंद्र से मन उचट गया। वह तीन बार टेस्ट करके देख चुकी थी, पहली बार में वह शायद इसीलिए तृप्ति कर पाया था क्योंकि बिना पूरा तैयार हुए कामना ने आगे बढ़ने की अुनमति नहीं दी थी। और इंद्र भी अधिक मेहनत कर रहा था क्योंकि उसके लिए भी पत्नी के अलावा यह दूसरी नयी लड़की थी जिसके साथ वह शामिल हो रहा था। लेकिन दूसरी बार से हिचक दोनों की टूट चुकी थी तो इंद्र कामना में शायद अपनी पत्नी को ही देखने लगा था जो सेक्स के वक्त भी कुछ कहती नहीं थी लेकिन दूसरी तरफ कामना अनुभवी थी। उसके पति के अलावा भी कई साथी रह चुके थे और वह जान चुकी थी कि प्यार क्या...सेक्स क्या और मजबूती क्या? कामना यह भी समझ चुकी थी कि इंद्र की पत्नी झूठ बोली थी कि इंद्र उसे तृप्त कर पाता है। वह बहुत जल्दी ठंडा हो जाता था और ऐसा मर्द स्त्री को संतुष्ट नहीं कर सकता।


 फिर इंद्र अपने किसी न किसी जरुरत का रोना रोकर कामना से पैसे मांगने लगा था। एक बार हुआ, दो बार हुआ लेकिन यह तो उसकी आदत बनती जा रही थी पैसे मांगने की। कामना समझ गयी, कि इंद्र उससे प्यार नहीं करता, सिर्फ सोने के लिए आता है और इसके एवज में पैसे मांग रहा है। जबकि कामना के पति की आर्थिक हालत वैसे ही अच्छी नहीं थी, वे हर महीना 400 रुपये के मकान का किराया भी समय पर दे नहीं पाते थे। इस हालत में कामना द्वारा बचाकर रखे पैसों को भी इंद्र निगलने लगा था। यद्यपि उस दौरान कामना के एक काका और मामा मिलने आने पर उसे कभी कभी आशीर्वाद रूप में कुछ रुपये दे देते थे। कामना ये रुपये पति से छुपाकर रख रही थी आगामी इमरजेंसी को सोचकर लेकिन इंद्र की संगत में यह सब नष्ट हो रहा था। धीरे धीरे कामना इंद्र की असली मंशा समझने लगी और अब वह मन ही मन इंद्र से पीछा छुड़ाना चाह रही थी। इसीलिए उसने धीरे धीरे इंद्र से बचना शुरु कर दिया।


यद्यपि कैसी भी परिस्थिति रही, कामना ने गीत और कविता लिखना नहीं छोड़ा। चाहे उसे कागज पर उतारा या नहीं, लेकिन हर परिस्थिति को अपनी रचना के माध्यम से व्यक्त करना जारी रहा। यद्यपि पति के साथ में उसकी रचनाओं को कुछ पत्रिकाओं में जगह मिलना शुरू हो गया था। इसी पत्नी प्रेम में एक बार गंभीर उसे दिल्ली के मशहूर स्टूडियो के एक परिचित से मिलाने ले गए जो उस स्टूडियो में म्यूजिक देने का काम करते थे। नाम था विष्णु देव। लम्बी दाढी, गंभीर प्रकृति और बस अपने काम से मतलब रखने वाले थे। उनके बारे में कुछ अन्य स्रोत से कामना को पता चला था कि वे शादीशुदा है, छोटी उम्र में ही शादी हो गयी थी अथवा वजह क्या थी, पता नहीं लेकिन पत्नी से वैरागी हो गये थे। उम्र 30 से अधिक उनकी नहीं रही होगी जबकि कामना उस वक्त 19-20 साल की थी।


विष्णु देव को पत्नी पसंद नहीं थी तो तलाक बेशक नहीं लिया था लेकिन उनसे शारीरिक संबंध बनाना छोड़ दिया था।उन्होंने कामना के गीत लिखने की क्षमता को उतना नहीं सराहा जितना कि उन्हें उसकी देह भा गयी। यह बात कामना को बाद में पता चला।


कामना थी भी भोली, उसे आसानी से सामने वाले पर विश्वास हो जाता था। चूंकि उसका मन साफ था तो वह सामने वाले को भी साफ मन वाला समझती थी। जितनी देर भी कामना उसके आसपास रही, वह समझ गया कि कामना अन्य औरत से अलग है। न यह शृंगार करती है और न कोई बनावटीपन था उसमें। जब भी उसने कामना की आँखों में देखा, इसमें विश्वास व प्यार ही नजर आया। वह म्यूजिक डायरेक्टर कामना के इस निश्छल व्यवहार से बहुत प्रभावित हुआ और उसके भोलेपन, निश्छलता एवं सुंदरता का कायल होता गया और उसे कुछ अधिक तरजीह देने लगा। तभी वह उसके पति गंभीर से बोला कि कामना को प्रोफेशनली गीत लिखवाने के लिए कुछ ट्रेनिंग देना पड़ेगा, और इसके लिए उसे बार बार आना पड़ेगा। आप अपना काम निबटाओ और कामना को मेरे पास छोड़ दिया करो, मैं दिनभर में इसे गीत लिखने का हुनर सीखा दूंगा, फिर आप शाम को ले जाना। गंभीर को विष्णु देव के इस बात पर भरोसा हो गया और अब वह जब भी समय मिलता, कामना को विष्णु देव के पास छोड़कर जाने लगा। 


विष्णु देव इसी ताक में था।  कामना जब अकेली आई तो उसने पहली बार उसे जी भरकर प्यार से देखा। पत्नी से मन उचट जाने के बाद वह सालों से ब्रह्मचारी सा होकर जी रहा था। उसे कोई औरत अच्छी ही नहीं लग रही थी लेकिन कामना...गजब !  वह उसमें अपने को खिंचता महसूस करने लगा और उसे छूने की कल्पना करने से अपने को रोक नहीं पाया। लेकिन इसक लिए जरुरी था कि कामना भी तैयार हो लेकिन कैसे होगा? तभी उसका दिमाग काम किया और वह कामना को अलग से भी मीठा मीठा सपना दिखाने लगा। उसने कहा कि वह बहुत जल्द कामना के गीत को म्यूजिक देगा लेकिन इसके लिए वैसा गीत लिखने की क्षमता विकसित करनी पड़ेगी किंतु उसके लिए जरुरी कि म्यूजिशयन और गीतकार दोनों आपस में दोस्त हो। दोनों एक दूसरे को समझें। 


"हां क्यों नहीं, मैं और मेरे पति तो आपको अपना समझते ही है, तभी तो उन्होंने आप पर भरोसा मुझे यहां छोड़कर गये हैं। आप मेरे पति के दोस्त तो मेरे भी दोस्त ही हो गये।"यह कहते हुए कामना विष्णु देव के दिखाए सपने में खोने लगी।


 सोचने लगी कि बहुत जल्द उसके गीत भी म्यूजिक कैसेट में बजेंगे। लोग उसे नाम से पहचानेंगे और वह बड़े गीतकार रचनाकार के रूप में जानी जाएंगी।  तभी उसने महसूस किया कि विष्णु देव उसके पास खिसक कर उसका गाल छूने लगा है। 


कामना सिहर सी गयी और प्रश्नवाचक ढंग से विष्णु देव को देखते हुए कहा, "ऐसे क्यों कर रहे हैं, यह तो गलत है न?"

"कहां गलत कामना, कि जब तुमने दोस्त स्वीकार ही कर लिया तो इतना छूने का हक तो बनता ही है, प्लीज...प्लीज कहते हुए उसने कामना को बाहों में भर लिया। 

कामना कसमसाने लगी लेकिन विष्णु देव बिना उसे छोड़े उसके गाल और होंठों को चूमते हुए कहता जा रहा था, "हाँ, मिलकर के बहुत आगे चलना है हम दोनों को, तुम साथ दोगी ना प्लीज...प्लीज..?"


विष्णु देव कामना को यूँ बाहों में भरकर रिक्वेस्ट करता जा रहा था कि वह इस स्पर्श का कड़ा विरोध न कर पायी, शायद इसके पीछे का यह विश्वास था कि विष्णु देव उसके गीत को म्यूजिक देगा, उसे प्रसिद्ध बना देगा तो जरा स्पर्श करने से बिगड़ता ही क्या है? सिर्फ ऊपर ही तो छूआ है!"

बिना किसी और से यह बात शेयर किए कामना पति के आने पर घर चली गयी। विष्णु देव ने उसके पति से फिर कामना को भेजने का निवेदन किया।

इधर सालों बाद विष्णु देव किसी औरत को छूआ था और उसे कामना के गाल और होंठों के स्पर्श में इतना आनंद आया कि वह सोचने लगा, "अब तक मैं बेवकूफ था जो स्त्री से दूर था, जब स्त्री का स्पर्श इतना मजा देता है तो पिछला सारा समय मैंने यूँ ही बेवकूफी में उड़ा दिया। उफ् यह कामना...पहले क्यों नहीं मिली, यह तो अमृत है...अगर यह पूरी मिल जाए तो क्या पता, मेरा नीरस जीवन भी रंगीन हो जाए।"


कहां विष्णु देव अपने ब्रह्मचर्य के लिए प्रसिद्ध थे किंतु कामना ने उन्हें स्त्री प्रेमी बनने के लिए तैयार कर दिया।


अगले दिन जब कामना फिर आई तो उन्होंने स्वयं आर्डर करके स्वादिष्ट भोजन मंगवा लिया, अपने और कामना के लिए।


दोनों ने साथ मिलकर भोजन किया। कामना ने अपनी कुछ नई रचनाओं पर चर्चा की तो बोले, "वह काम सब बाद में होगा, अभी हम अपनी दोस्ती की बात करें कि जब यह गहरी होगी तो सब चीज अच्छी लगने लगेगी, अच्छी रचना बनने भी लगेगी।"


कामना कुछ बोली नहीं क्योंकि वह धीरे धीरे विष्णु देव के दिखाए सपनों में फंसती जा रही थी। और विष्णु देव यही चाहता था, "कामना को मीठा सपना दिखाकर उसे पाने की तरफ बढ़ना।


"स्वादिष्ट भोजन दोनों को ही अच्छा लगा था। साथ ही विष्णु देव ने जानबूझकर कमरे में एसी चला दिया था ताकि ठंडा लगे और कामना कंबल के अंदर बैठना चाहे। 


ऐसा ही हुआ। कामना ने खाना खाकर कंबल अपने देह पर डाल लिया। विष्णु देव उसी कंबल में आ गया और फिर कामना के पास खिसककर उसे स्पर्श करने लगा। यह सच था कि कामना को विष्णु देव से प्यार नहीं था लेकिन उसके दिखाए मीठे सपने ने उसकी बुद्धि को हर लिया था और यह गलत है, समझते हुए भी उसका विरोध नहीं कर पा रही थी। अबकी बार विष्णु देव उसके होंठों से आगे बढ़कर समीज के ऊपर से ही उसके वक्ष को छूने की नकाम कोशिश करने लगा। कामना ने इस पहल को मना करने की कोशिश की तो वह ठहर गया और यूँ ही दूसरी दिशा में बात करने लगा। फिर उसी मीठे सपने पर अटक गया।


जब कामना सहज हुई व मीठे सपने की सोचकर इसे यूँ ही नजर अंदाज कर दिया। विष्णु देव बोला, "कामना तुम मेरी दोस्त हो ना तो छूने का हक बनता ही है किंतु, तुम्हारी  इजाजत के बिना मैं कुछ नहीं करूंगा। देखा ना कि तुमने मना किया तो छोड़ दिया।"


"हां पता है, थैंक्स।" कामना बोली


"लेकिन एक बात कहूँ  तुम बहुत अच्छी हो. बहुत प्यार करने लगा हूं। मेरे मन का एक काम करोगी प्लीज..।" विष्णु देव कामना का हाथ पकड़ उसे प्यार से सहलाते हुए बोला।"


हां क्या, बोलिए ना!" कामना ने जबाव दिया।"तुम्हें तो पता ही होगा कि मुझे स्त्रियों से अरुचि हो गई  थी, सालों बाद स्त्री यानी तुम अच्छी लगने लगी हो। मैं तुम्हें साड़ी में देखना चाहता हूं। तुम आओगी ना कल साड़ी पहनकर...प्लीज..प्लीज..मना मत करना...मेरा दिल टूट जाएगा।"


इधर विष्णु देव बहुत बेचैन अपने को महसूस कर रहा था। काफी दिनों के बाद उसका 'मर्द' जगा था और उसे अब कामना चाहिए थी, पूरी कामना ' बाहर से अंदर तक'। इसीलिए उसने जानबूझकर कामना को साड़ी पहनकर आने का नाटक किया था।


इधर कामना को विष्णु देव का यह आग्रह मानना कोई खराब न लगा। वह अगले दिन साड़ी पहनकर आ गयी। साड़ी में वह गजब की सुंदर लग रही थी और विष्णु देव यहीं चाह रहा था कि कामना को उस कपड़े में देखे जिसमें उसकी सुंदरता तो उभरकर आए ही, साथ ही उससे बिना गिड़गिड़ाए भी उसे भोगा जा सकें।


कामना और दिन की तरह ही सहज थी लेकिन विष्णु देव के मन में तूफान सा भरा था। वह कामना के आते ही साथ साथ खाने पीने का मनभावन सामान मंगवा लिया। दोनों ने बैठकर खयस। इसी बीच कामना जब खाना खाकर फ्रेश हो कमरे के अंदर आयी तो उसके आते ही विष्णु देव कामना से नजर बचाकर वह कमरे को लाक कर लिया। कामना स्वभावत खाना खाने के बाद पुनः ठंढ महसूस होने पर कंबल अपने ऊपर डाल ली।


इस बार विष्णु देव ने कामना की तरफ तकिया बढ़ाया और कहा, "आराम से लेटकर टीवी देखो ना, और टीवी को खोलकर उसकी आवाज़ बढ़ा दिया।कामना बिना इसे अन्यथा लेते हुए लेट गयी और टीवी देखने लगी।


तभी कामना देखती है कि विष्णु देव उसके पैर के तरफ बैठ गया। 

" अरे आप पैर के पास क्यों बैठ गये, मेरी  सीध में बैठिए ना?"

 "नहीं कामना, मुझे यही बैठने दो कि मेरे ख्याल से ऊंचाई पर मनुष्य नीचे से ही ऊपर तक पहुंच सकता है। और हां, जो पुरुष महिलाओं को अपने पैर के पास बैठाकर उन्हे नीच समझते हैं, गलत समझते हैं। उन्हें पता ही नहीं कि इसी निचले पायदान से महिला ऊपर तक पहुंच जाती है और पुरुष ऊपर रह‌ने के भ्रम में दुखी और असंतुष्ट जीवनभर रह जाता है। मैंने भी अब तक यही किया था लेकिन अब और नहीं! "


कामना विष्णु देव का अजीब तर्क सुनकर स्तब्ध रह गयी और मन ही मन स्त्री के प्रति आदर की भावना को सराहा। किंतु यह क्या, उसने महसूस किया कि विष्णु देव उसके पैर को सहलाने लगा है। कामना शिकायत के लहजे में, " मेरे पैर को क्यों छू रहे हैं, पाप लगेगा मुझे, प्लीज मत छूइए।"


"अरे नहीं, मैं यह ढूंढने की कोशिश कर रहा हूं कि कैसे महिला पैर से ऊंचाई तक पहुंची होगी, प्रयास मैं भी करना चाहता हूं तो...फिर तुम्हें पाप नहीं लगेगा कि मैं यह स्वेच्छा से कर रहा हूं।"


कामना ने कुछ जवाब नहीं दिया किंतु तभी महसूस किया कि विष्णु देव उसके पैर से ऊपर अपना हाथ बढ़ा रहा है और अजीब तरह से स्पर्श करके उसमें गुदगुदी पैदा कर रहा है। फिर सोने की स्थिति में साड़ी उठ भी गया था तो वह उसका लाभ आसानी से लेने लगा था।


तभी कामना  उसे रोकने की कोशिश करती हुई बोली, " प्लीज, आगे मत हाथ बढ़ाइये, यह गलत है!"


"तो क्या तुम हाथ नहीं बढ़ाऊंगा तो बुरा नहीं ना मानोगी?

नहीं मानूंगी!" कामना ने जवाब दिया।

"पक्का"

"हां पक्का!" कामना मन ही मन उससे बचने की आकांक्षा करते हुए बोली।

तभी कामना देखती है कि‌ विष्णु देव ने अब उसे चूमना शुरु कर दिया। 

इसे देख कामना कहती है, "यह क्या है, आपको कहा था ना कि आगे मत बढ़ाइए, फिर क्यों?"

"हाँ, कहा था लेकिन हाथ बढ़ाने के लिए मना किया था..चूमने या और चीज के लिए नहीं!''


कामना विष्णु देव को रोकना चाहती रही लेकिन उस पर तीव्र 'काम' सवार हो चुका था। ऐसा 'काम' कि बिना‌ लिए माने नहीं । और वह उसके चूमने की रफ्तार बढ़ता ही जा रहा था। फिर वह साड़ी पहनी हुई थी तो भी वह विष्णु देव को रोक नहीं पा रही थी क्योंकि धीरे धीरे ओपेन करना उसके लिए आसान होता जा रहा था। लेकिन कामना इसे बुरा मान रही थी। लेकिन विष्णु देव के लिए यह बहुत जरूरी था। शायद इतना जरूरी कि वर्षों के ब्रह्मचर्य को वह कामना पर आकर तोड़ देना चाह रहा था। वह इस पहल से नाराज हो रही थी लेकिन विष्णु देव अपनी पकड़ बढ़ाता ही जा रहा था। तभी ...क्रमशः...





-कुलीना कुमारी

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