Thursday, 13 October 2016

खुशियों की राह, Happiness




Kulina Kumari
खुशी बहुत सकारात्मक शब्द है और हर प्राणी इसे प्राप्त करना चाहता है। मगर इसी के साथ यह भी बड़ा सच कि वहीं व्यक्ति इसे हासिल कर पाता है जिसे खुद से प्यार होता है और ‘खुशी की’ जो खुद को हकदार समझता है। न केवल इतना बल्कि यह भी कि जो इसके लिए प्रयास भी करता है।
यद्यपि इसी के साथ यह भी सच कि जिस तरह से प्रत्येक का सपना व लक्ष्य अलग हो सकता है, कुछ उसी तरह से कौन कब तक व किस प्रकार से लक्ष्य प्राप्त कर सकता है, यह उसकी जाति, धर्म, लिंग व परिस्थितियों के आधार पर निर्धारित होती है। जैसे अगर हमारा समाज पुरुषवादी तो समान लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पुरुष को कम मगर महिला को उससे अधिक मेहनत करनी पड़ेगी।
चूंकि हमारी सामाजिक रूपरेखा ऐसी बनी है कि पुरुष को शुरु से ही खास बताया जाता है, इसीलिए उसकी भावना, सपने व विचार को न केवल महत्व दिया जाता है बल्कि बढा-चढा कर पेश भी किया जाता है। इससे पुरुषों के लिए आगे बढने की राह आसान हो जाती हैं और उसके अपने अरमानों के मंजिल तक पहुंचना भी।
यद्यपि ऐसा नहीं है कि महिलाएं कमजोर और उसे अपने मंजिल तक पहुंचने की क्षमता नहीं बल्कि घर-परिवार, बच्चे, सामाजिकता, मूल्य आदि उस पर थोपकर उसे सेवा के लिए ही मजबूर करने का प्रयास किया जाता है। इस हेतु जानबूझकर पुरुषवादी समाज ने महिला और पुरुष में कुछ फर्क पैदा किया गया है। जैसे न केवल सामाजिक रूप से पुरुष के लिए संपŸिा का अधिकार जन्मजात तय किया गया है बल्कि पुरुष को नाराज होने का, गुस्सा करने का या अपना बड़प्पन जताने का अधिकार दिया गया है मगर ऐसा अधिकार महिलाओं को नहीं है। प्रायः महिला चुप्पी के साथ अपना दर्द-पीड़ा सहती रहती है और खुद पर उसका ध्यान तब जाता हैं जब वह बीमार हो जाय और घरेलू जिम्मेदारी नहीं निबटा पाने की वजह से वह लोगों की आंखों में खटकने लगे।
महिला का भी यह दोष कि अपने घर-परिवार का सोचते-सोचते वह अपने लिए सोचना छोड़ देती है और बदले में उसे मिलता है जिम्मेदारियों का बोझ, न प्यार और न अधिकार। जब तक उसे इस बात का पता चलता है, बहुत देर हो चुकी होती है। उसके सपनों के पंख टूट चुके होते हैं, अपने लिए नया करने की शारीरिक क्षमता भी गुम हो चुकी होती है। फलस्वरूप लम्बे अवधि तक घर की जिम्मेदारियों का बोझ उठाने वाली महिला, शरीर से कमजोर होने पर कोई उसकी परिचर्या नहीं करना चाहता। उल्टे कभी किसी सदस्य के बीमार पड़ने पर जी-जान से परिचर्या करने वाली मां या महिला के मरने की दुआ करने लगते हैं परिवार के सदस्य।
यद्यपि मातृ धर्म व मूल्य की बात तो खूब की जाती है मगर सच्चाई इसके उलट होती है। जो कमाऊं और सफल, परिवार और समाज उसे ही अधिक मान देता है।
अतः जिस भी महिला को अपनी खुशियां चाहिए, उन्हें अपना लक्ष्य तय करना होगा। उन्हें जिस भी क्षेत्र में आगे जाना, उस हेतु जी-जान से प्रयास करना होगा। महिला को इतना बुद्धिमान बनना होगा कि उसकी राह रोकने वाले हर तिकड़म या बहाना को काट सके और वह भी खास है, अपने बात-व्यवहार से यह साबित कर सकंे। जितने भी लोग सफल, अपने संकल्प, मेहनत और प्रयास शक्ति की वजह से। महिलाओं को भी अपनी सफलता के लिए कमजोरियों से ऊपर उठकर मजबूती के लिए हर संभव प्रयास करना होगा। तब खुलेंगे उसके लिए दरवाजा। तब मिल पाएगी खुशियों की राह।

Happiness

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