Sunday, 30 October 2016

हम त्योहार उसी दिन मनाते हैं, We celebrate festivals on that days




हम त्योहार उसी दिन मनाते हैं
जब प्यार कहीं हमें मिलता है
सम्मान कही हम पाते हैं

होली क्या दिपावली क्या
हमारा जश्न उसी दिन होता है
जब हमारी मेहनत सराही जाती हैं
अच्छा हमें बताते हैं

फर्ज की बलिवेदी पर हम चढ़े ही रहते
कभी उतरे तो लगे आराम हमारे हिस्से में भी हो
किसी के मन में प्यार का सागर लहराये
कुछ अधिकार हमारे हिस्से में भी हो
जब वो अपने मन का मालिक हमें बताते हैं
हम त्योहार उसी दिन मनाते हैं

हम जननी भी बने, पालनकर्त्ता माता भी
मगर जब बच्चंे बड़े हुए तो हमको भूल गए
अब हमारी ममता वो समझते ही नहीं
हम क्या चाहे, सुनते ही नहीं, अपना ही सुनाते गए
जब कभी बच्चा मेरा मेरे पास आ, हाल मुझसे पूछता हैं
हम त्योहार उसी दिन मनाते हैं..

ब्याह कर मायके का चौखट क्या पार किया
हमारे माता-पिता तो हमको भूल गए
उन्हें याद ही नहीं रहे, उनकी बेटी भी कहीं
वो तो अपनी दुनिया में गुम हो गए
जब कभी भूले-बिसरे वो हमारी खोज करते हैं
हम त्योहार उसी दिन मनाते हैं..

समाज के लिए भी हमारा योगदान कम नहीं
मगर इसका श्रेय हमको मिलता ही नहीं
कितना भी अच्छा करम करते जाए
मगर पुरस्कार जैसे हमारे लिए बना ही नहीं
जब कभी सामाजिक प्रतिष्ठा हम पाते हैं
हम त्योहार उसी दिन मनाते हैं..

-कुलीना कुमारी

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