Thursday, 27 October 2016

तलाक सिर्फ आपसी सहमति से, Divorce by the mutual consent

चित्र http://slodive.com/ से साभार



प्रत्येक व्यक्ति को जीने के लिए कुछ मूलभूत जरूरत होती है। रोटी, कपड़ा, मकान तो न जाने कब से बुनियादी जरूरत में शामिल है मगर इसके साथ ही एक अन्य जरूरत है-युवा इंसान को सोने के लिए पार्टनर चाहिए। इसी आवश्यकता के फलस्वरूप प्यार भी होता है व अपोजिट सेक्स के बीच आकर्षण भी। बड़े-बुजूर्ग अथवा अभिभावक इस बात को समझते हैं, इसलिए सामाजिक अथवा कानूनी रूप से अपने बच्चों के युवा होने पर सामाजिक विधि-विधान के हिसाब से युवक एवं युवती की शादी करायी जाती है, उनकी सेक्सुअल जरूरत को पूरा करने के लिए। परिवार की धारणा विवाह संस्था पर व विवाह से उत्पन्न संतान को वैध भी कहा जाता है, तो इस बहाने न केवल परिवार फलता-फूलता है बल्कि बच्चों को भी माता-पिता के साथ सामाजिक सुरक्षा मिल जाती है।
अगर पति-पत्नी में आपसी प्यार व विश्वास हो व दोनों एक-दूसरे के प्रति कर्Ÿाव्यनिष्ठ हो तो विवाह संस्था जैसी बढिया कोई चीज नहीं मगर विवाह संस्था में तब विकृतियां आ जाती है जब पति-पत्नी का आपस में बन न रहा हो और एक-दूसरे के प्रति मन में नफरत भर जाय। तब आपसी सद्भावना नहीं आरोप-प्रत्यारोप व प्रताड़ना का दौर शुरू हो जाता है और ऐसे में एक-दूसरे की उपस्थिति खटकने लगती है।
इन परिस्थितियों से उबरने के प्रयास के रूप में या एक-दूसरे से अलग होने की चाह के नाम पर हमारी ही सामाजिक व्यवस्था में तलाक का भी विधान है।
सरसरी तौर पर देखने पर लगता है कि जब एक-दूसरे के प्रति अरुचि होने लगे, दोनों या कोई भी एक पक्ष को अगर रुटीन में हिंसात्मक व्यवहार झेलना पड़े या डर-डर के जीना मजबूरी बनने लगे तो पति-पत्नी को अलग हो जाना चाहिए। तलाक ले लेना चाहिए क्योंकि नरकमय जीवन से एकल जिंदगी भली।
इन वजहों के आधार पर कहा जा सकता है कि किसी भी धर्म में तलाक की प्रक्रिया आसान होनी चाहिए ताकि व्यक्ति अपने पार्टनर के साथ खुशनुमा जिंदगी जी सकें व जिसका साथ अरुचिकर लगें, उसके जगह नया पार्टनर ला सकें। 

हां बच्चों की जिम्मेदारी हर हाल में नजरअंदाज नहीं की जानी चाहिए और न नजरअंदाज की जाय महिला की आवश्यकता अगर वह पति पर निर्भर हो, विशेषकर आर्थिक सुरक्षा मिले ।
इस ख्याल से यदि आनन्दायी जीवन हेतु तलाक सामान्य प्रक्रिया में शामिल हो जाय तो शायद बुरी बात नहीं अगर यह अधिकार एकतरफा न हो यानी सिर्फ पुरुष के मरजी पर निर्भर न हो।

यद्यपि उपरोक्त बातें उचित होने के बावजूद हमारे देश में जहां तलाक हो भी जाता है, वहां कितनी ही केस में महिला व उसके बच्चों को उचित हक कानूनी रूप से नहीं मिल पाता। या फिर इसमें बहुत कठिनाइयाँ होती है अगर महिला आर्थिक सक्षम नहीं तो उसे बहुतेरे मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

यह कठिनाईयां महिला के विशेषकर परावलम्बी होने की वजह से है। अगर वह आत्मनिर्भर हो तो तलाक हो जाय और उसे पति से आर्थिक संबल न भी मिले तो जीना शायद मुश्किल न हो। वो अपना व बच्चों का न केवल भरण-पोषण कर सकती है बल्कि पति से अलग होने के विकल्प के रूप में पुरुष के तरह ही किसी अन्य से शादी भी कर सकती है। पे करके किसी को रख सकती है अथवा किसी के साथ ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रह सकती है मगर यह सब उन परिस्थितियों में संभव जब वह सबल हो, आर्थिक सक्षम हो। जब तक हमारे भारत में ऐसी परिस्थितियां नहीं आई, तलाक महिला के जीवन को अस्तव्यस्त कर देता है। विशेषकर तब तक के लिए तलाक अंतिम विकल्प होना चाहिए और अधिकतम स्तर पर एक-दूसरे को झेलने की कोशिश होनी चाहिए। वैसे ऐसा होता भी है करीब-करीब हर घर में विशेषकर महिला के तरफ से। तभी पति साढ़ जैसा बलशाली और बीवी बकरी से भी न्यूनतम स्तिथि में दिखती है।

हां , तलाक की प्रक्रिया सिर्फ उन परिस्थितियों में सरल की जानी चाहिए जहां पुरुष ही नहीं, महिला भी सक्षम हो और दोनों सहमति से इसे लेने को तैयार हो। वरना अगर महिला पक्ष से इंकार हो तो पुरुष को तलाक मिलना ही नहीं चाहिए क्योंकि महिला परतंत्रता के जड़ में पुरुषवादी समाज और इसकी सजा तमाम पुरुषवादी समाज को मिलनी चाहिए।


हां महिला के खिलाफ चरित्रहीनता का आरोप लगा उससे बरी होने का कानूनी कारण भी उचित नहीं। जीवन में कितनी ही परिस्थितियां ऐसी आती है, जहां महिला ही नहीं, पुरुष भी संवेदनशील हो जाते हैं। अगर ऐसा पुरुष कर ले तो ठीक, वहीं पति के अनुपस्थिति में अगर महिला का किसी से रिलेशन बन जाय तो यह तलाक का आधार क्यों होना चाहिए, अगर वह रूटीन में नहीं है।

यह अच्छी बात कि केंद्र सरकार व सामाजिक कर्मी इस्लाम में लागू तीन तलाक की प्रक्रिया व उस वजह से मुश्किलों का सामना करने वाली महिलाओं के हित में कानून बनाने का प्रयास कर रहे हैं। मगर इसे बदलने व महिलाओं के पक्ष में होने में अभी भी पता नहीं कितना समय और लगे। 


यद्यपि कठिनाईयां तो वहां भी जहां पति पत्नी को तलाक तो नहीं देता, मगर नौकर से भी बदतर उसके प्रति भाव रखता है। अपनी कमाई का उस पर खूब धौंस जमाता है और गुलाम से भी उसकी बदतर स्तिथि होती है। मगर किसी भी बुरी परिस्थितियों से उबरने का सबसे बढिया उपाय स्वावलम्बन है। यह वो बल है जो अपना जीवन आप संवारने का बल देता है। जिस भी बेटियों, अविवाहित अथवा विवाहित महिलाओं को इस गुलाम परिस्थिति से उबरने का इरादा है या इसमें फंसना नहीं चाहती, उन सब लड़कियों से निवेदन कि वे न केवल अच्छा पढे-लिखे बल्कि अपने पैर पर सक्षम होने का प्रयास करे ताकि मनुष्य जीवन पाकर भी वे खुटेंसी हुई जानवर जैसी जिंदगी जीने को मजबूर न हो। 

इसलिए खुद को मजबूत बनाए, शारीरिक-मानसिक व आर्थिक तीनों ही रूप से तो चाहे विवाह संस्था में रहंे या अलगाव के साथ, कोई भी मुश्किलें आपकी खुशियों को नहीं छीन सकता।

-कुलीना कुमारी, 26-10-2016

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